Katni News :गृहस्थ को धन की आवश्यकता पड़ती है, उसके बिना गृहस्थी की गाड़ी आगे नहीं बढ़ती

कटनी।।गृहस्थ को धन की आवश्यकता पड़ती है, उसके बिना उसकी गृहस्थी की गाड़ी आगे नहीं बढ़ती। इसलिये धन गृहस्थ की शोभा माना गया है। साधु को धन की जरूरत कदापि नही है। साधना में सहायक उसकी आवश्यकतायें समाज द्वारा पूर्ण हो जाती है, इसलिये साधुगण धन पैसा से हमेशा दूर रहते हैं। और गृहस्थ को धन का अर्जन करना पड़ता है। धनार्जन के लिये मनुष्य व्यापार, धंधा करता है। यह  बात सच है कि दस प्राणों को चलाने के लिये अन्न ग्यारहवां प्राण माना गया है और अन्न रूप ग्यारहवें प्राण की पूर्ति धन से होती है। अतः धन बारहवाॅ प्राण माना गया है। मनुष्य की केवल आवश्यकताओं की पूर्ति की बात अलग है लेकिन मानव मन के साथ अनेक आकांक्षायें भी जुड़ी हुई हैं, इन सब की पूर्ति न्याय और नीति से संभव नहीं है क्यों कि अकेले पेट की ही बात नहीं है, कामनाओं की पेटी भी तो साथ बंधी है पेट तो फिर भी न्याय नीति से भरा जा सकता है किंतु पेटी अन्याय और अनीति से ही भरा जा सकती है। इन सब की पूर्ति के लिये व्यक्ति किसी भी तरह का कार्य करने को तैयार हो जाता है। इसी से समाज में अनेक तरह की विकृतियां फैल रही है। उक्त आशय पर चर्चा करते हुये   मुनिश्री समता सागर जी महाराज ने व्यक्त किए। मुनिश्री ने 
चर्चा करते हुये आगे बतलाया कि गृहस्थ को अपनी आजीविका पर ध्यान देना चाहिए। उसकी आजीविका, सम्यक् श्रेष्ठ कुल के योग्य होनी चाहिए। जैसा-तैसा-कैसा भी हो पर पैसा हो, इस मानसिकता पर रो लगनी चाहिए और आय के स्रोत पर सावधानी से विचार होना चाहिए। गृहस्थ को धंधा करने की अनुमति तो है पर अंधा और अंधाधुध ध्ंाधा करने की अनुमति नही है। 
मगन जैन

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